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ناكاجيما كي -82

ناكاجيما كي -82


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ناكاجيما كي -82

كان Nakajima Ki-82 تصميمًا لطائرة جديدة لتحل محل Nakajima Ki-49 Donryu المخيب للآمال ، لكن نجاح Mitsubishi Ki-67 يعني أن التصميم لم يكتمل أبدًا.

خلال الثلاثينيات من القرن الماضي ، أنتجت ميتسوبيشي معظم القاذفات اليابانية الثقيلة ، ولكن في عام 1938 خسروا أمام ناكاجيما Type 100 Heavy Bomber Donryu (Ki-49). كان من المفترض أن تحل محل القاذفة Mitsubishi Ki-21 Type 97 Bomber ، لكن الطائرة الجديدة لم ترق إلى مستوى التوقعات ولم تحل محل الطائرة القديمة تمامًا.

في بداية عام 1941 ، طلب الجيش الياباني من ميتسوبيشي أن تبدأ العمل على قاذفة جديدة لتحل محل ميتسوبيشي كي -49. تمكنت Mitsubishi من الرد بسرعة كبيرة وتمت الموافقة على مسودة مخططها في 17 فبراير 1941. سيصبح هذا التصميم Mitsubishi Ki-67 Hiryu ، أفضل قاذفة للجيش الياباني في الحرب العالمية الثانية.

لم يُطلب من ناكاجيما إنتاج تصميمه الخاص لمفجر جديد حتى وقت لاحق في عام 1941. كان من المقرر أن تكون الطائرة الجديدة نسخة أصغر وأخف وزنًا من الطائرة كي -49. بدأ العمل في قسم Mitake للأبحاث في ناكاجيما ، ولكن بحلول منتصف عام 1942 كان من الواضح أن التصميم لن يكون منافسًا وتم التخلي عن العمل في Ki-82.


ناكاجيما كي 6

ال ناكاجيما كي 6 & # 32 (九五 式 二 型 練習 機 ، & # 32Kyūgo-shiki nigata renshuki ؟ ) إصدارًا مرخصًا تم إنتاجه من فوكر سوبر يونيفرسال النقل الذي بنته شركة ناكاجيما للطائرات في الثلاثينيات. في البداية ، تم استخدام النسخة العسكرية من قبل الجيش الإمبراطوري الياباني في مجموعة متنوعة من الأدوار ، بدءًا من الإخلاء الطبي إلى طائرات النقل والتدريب. تم استخدامه على نطاق واسع في مناطق القتال في مانشوكو وفي الصين خلال الحرب الصينية اليابانية الثانية.


تاريخ موجز للذكاء الاصطناعي

فكرة ظهور الأشياء غير الحية ككائنات ذكية كانت موجودة منذ فترة طويلة. كان لدى الإغريق القدماء أساطير عن الروبوتات ، وقام المهندسون الصينيون والمصريون ببناء الإنسان الآلي.

يمكن إرجاع بدايات الذكاء الاصطناعي الحديث إلى محاولات الفلاسفة الكلاسيكيين لوصف التفكير البشري كنظام رمزي. لكن مجال الذكاء الاصطناعي لم يتم تأسيسه رسميًا حتى عام 1956 ، في مؤتمر في كلية دارتموث في هانوفر ، نيو هامبشاير ، حيث تمت صياغة مصطلح "الذكاء الاصطناعي".

كان العالم المعرفي بمعهد ماساتشوستس للتكنولوجيا مارفن مينسكي وآخرين ممن حضروا المؤتمر متفائلين للغاية بشأن مستقبل الذكاء الاصطناعي. نُقل عن مينسكي قوله في كتاب "AI: The Tumultuous Search for Artificial Intelligence" (Basic Books، 1994): "في غضون جيل واحد [.] سيتم حل مشكلة إنشاء" الذكاء الاصطناعي "إلى حد كبير". [آلات فائقة الذكاء: 7 عقود روبوتية]

لكن تحقيق كائن ذكي اصطناعي لم يكن بهذه البساطة. بعد عدة تقارير تنتقد التقدم في مجال الذكاء الاصطناعي ، انخفض التمويل الحكومي والاهتمام بالمجال - من عام 1974 و - 80 أصبح يعرف باسم "شتاء الذكاء الاصطناعي". تم إحياء الحقل لاحقًا في الثمانينيات عندما بدأت الحكومة البريطانية في تمويله مرة أخرى جزئيًا للتنافس مع جهود اليابانيين.

شهد الحقل شتاءً رئيسيًا آخر من عام 1987 إلى عام 1993 ، تزامنًا مع انهيار السوق لبعض أجهزة الكمبيوتر ذات الأغراض العامة المبكرة ، وانخفاض التمويل الحكومي.

لكن البحث بدأ في الانتعاش مرة أخرى بعد ذلك ، وفي عام 1997 ، أصبح Deep Blue من IBM أول كمبيوتر يهزم بطل الشطرنج عندما هزم الروسي الكبير غاري كاسباروف. وفي عام 2011 ، فاز نظام الإجابة على الأسئلة Watson الخاص بعملاق الكمبيوتر ببرنامج الاختبار "Jeopardy!" بفوزه على حامل اللقب براد راتر وكين جينينغز.

هذا العام ، احتل "روبوت الدردشة" الناطق بالكمبيوتر يوجين غوستمان عناوين الأخبار لخداع القضاة وجعلهم يعتقدون أنه كان بشريًا حقيقيًا خلال اختبار تورينج ، وهي مسابقة طورها عالم الرياضيات وعالم الكمبيوتر البريطاني آلان تورينج في عام 1950 كوسيلة للتقييم ما إذا كانت الآلة ذكية.

لكن الإنجاز كان مثيرا للجدل ، حيث قال خبراء الذكاء الاصطناعي إن ثلث الحكام فقط تم خداعهم ، وأشاروا إلى أن الروبوت تمكن من تفادي بعض الأسئلة بزعم أنه مراهق يتحدث الإنجليزية كلغة ثانية.

يعتقد العديد من الخبراء الآن أن اختبار تورينج ليس مقياسًا جيدًا للذكاء الاصطناعي.

قال بيرليس لـ Live Science: "الغالبية العظمى من الأشخاص في الذكاء الاصطناعي الذين فكروا في الأمر ، في الغالب ، يعتقدون أنه اختبار سيئ للغاية ، لأنه ينظر فقط إلى السلوك الخارجي".

في الواقع ، يخطط بعض العلماء الآن لتطوير نسخة محدثة من الاختبار. لكن مجال الذكاء الاصطناعي أصبح أوسع بكثير من مجرد السعي وراء ذكاء حقيقي شبيه بالإنسان.


جيولوجيا جبل فيزوف والأخطار

بدأ المخروط المعروف باسم Mount Vesuvius في النمو في كالديرا بركان Mount Somma ، الذي اندلع آخر مرة منذ حوالي 17000 عام. معظم الصخور التي اندلعت من فيزوف هي أنديسايت ، صخور بركانية وسيطة (حوالي 53-63٪ سيليكا). تخلق حمم أنديسايت ثورات بركانية متفجرة على مجموعة متنوعة من المقاييس ، مما يجعل فيزوف بركانًا خطيرًا ولا يمكن التنبؤ به بشكل خاص. انفجارات سترومبوليان (انفجارات الصهارة من تجمع في قناة البركان و rsquos) وتدفق الحمم البركانية من القمة وشقوق الجناح صغيرة نسبيًا. الثورات البلينية (الانفجارات الضخمة التي تخلق أعمدة من الغاز والرماد والصخور التي يمكن أن ترتفع عشرات الكيلومترات في الغلاف الجوي) لها مدى أكبر بكثير ، وقد دمرت مدنًا قديمة بأكملها بالقرب من فيزوف مع شلالات ضخمة وتدفقات بركانية. فيزوف هادئ حاليًا ، مع نشاط زلزالي طفيف (زلزال) وانبعاث غازات من فومارول في فوهة قمته ، ولكن النشاط الأكثر عنفًا يمكن أن يستأنف في المستقبل.

أعمدة من الطوب تقف بين أنقاض مدينة بومبي القديمة. مصدر الصورة iStockphoto / Evgeny Bortnikov.

ثوران فيزوف (1944)

منظر لنابولي في ذروة ثوران بركان جبل فيزوف في عام 1944. تم استخدام صورة فوتوغرافية لملفين سي شافير بإذن من مجموعات CUL الرقمية التابعة لجامعة Southern Methodist.

هل كنت تعلم؟
ثوران بركان فيزوف عام 79 ميلاديًا هو سبب استخدام علماء البراكين "بلينيان" لوصف السحب البركانية الكبيرة. كتب بليني الأصغر ، المؤرخ الروماني الذي شهد ثوران عام 79 بعد الميلاد ، أقدم وصف باقٍ للسحابة الطويلة التي على شكل شجرة والتي ارتفعت فوق البركان. يستخدم علماء البراكين في العصر الحديث هذا المصطلح لوصف الانفجارات البركانية العنيفة ذات الحجم الكبير والتي تنتج سحبًا سريعة التوسع من الصخور والرماد والغازات التي ترتفع لأميال عديدة في الغلاف الجوي. بعض الأمثلة الأكثر حداثة للانفجارات البلينيكية تشمل جبل سانت هيلينز في عام 1980 و بيناتوبو في عام 1990. هنا وصف بليني.


अनुक्रम

राजपूतों की उत्पत्ति

हर्षवर्धन के उपरान्त भारत में कोई भी ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जिसने भारत के वृहद भाग पर एकछत्र राज्य किया हो। इस युग में भारत अनेक छोटे बड़े राज्यों में विभाजित हो गया जो आपस मे लड़ते रहते थे। इनके राजा 'राजपूत' कहलाते थे तथा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के इस युग को 'राजपूत युग' कहा गया है। [19] राजपूतों की उत्पत्ति के सम्बन्ध मे इतिहास में कई मत प्रचलित हैं।

विदेशी उत्पत्ति

इसे मानने वाले राजपूतों की उत्पत्ति अग्निकुंड से उत्पन्न बताते हैं। यह अनुश्रति पृथ्वीराजरासो (चंदरबरदाई कृत) के वर्णन पर आधारित है। चंदबरदाई लिखते हैं कि परशुराम द्वारा क्षत्रियों के सम्पूर्ण विनाश के बाद ब्राह्मणों ने आबू पर्वत पर यज्ञ किया व यज्ञ कि अग्नि से चौहान ، परमार ، गुर्जर प्रतिहार व सोलंकी राजपूत वंश उत्पन्न हुए। [20] पृथ्वीराजरासो के अतिरिक्त 'नवसाहसांक' चरित، 'हम्मीररासो'، 'वंश भास्कर' एवं 'सिसाणा' अभिलेख में भी इस अनुश्रति का वर्णन मिलता है। कथा का संक्षिप्त रूप इस प्रकार है- 'जब पृथ्वी दैत्यों के आतंक से आक्रान्त हो गयी ، तब महर्षि वशिष्ठ ने दैत्यों के विनाश के लिए आबू पर्वत पर एक अग्निकुण्ड का निर्माण कर यज्ञ किया। इस यज्ञ की अग्नि से चार योद्धाओं- प्रतिहार ، परमार ، चौहान एवं चालुक्य की उत्पत्ति हुई। भारत में अन्य राजपूत वंश इन्हीं की सन्तान हैं।

विदेशी उत्पत्ति के समर्थकों में महत्त्वपूर्ण स्थान कर्नल जेम्स टॉड का है। इनके अनुसार राजपूत वह विदेशी जातियाँ है जिन्होंने भारत पर आक्रमण किया था। अग्निवंशी को हूण को क्षत्रिय का दर्जा देने के लिए गढ़ा गया था वे राजपूतों को विदेशी सीथियन जाति की सन्तान मानते इतिहासकार विदेशियों के समाज में यज्ञ द्वारा शुद्धिकरण की पारम्परिक घटना के रूप मे देखते हैं। [21] [22] तर्क के समर्थन में टॉड ने दोनों जातियों (राजपूत एवं सीथियन) की सामाजिक एवं धार्मिक स्थिति की समानता की बात कही है उनके अनुसार दोनों में रहन-सहन، वेश-भूषा की समानता، मांसाहार का प्रचलन، रथ के द्वारा युद्ध को संचालित करना अनुष्ठानों का प्रचलन अस्त्र-शस्त्र की पूजा का प्रचलन आदि से यह प्रतीत होता है कि राजपूत सीथियन के ही वंशज थे। [23]

विलियम क्रुक ने 'कर्नल जेम्स टॉड' के मत का समर्थन किया है। "वी.ए. स्मिथ 'के अनुसार शक तथा कुषाण जैसी विदेशी जातियां भारत आकर यहां के समाज में पूर्णतः घुल-मिल गयीं। इन देशी एवं विदेशी जातियों के मिश्रण से ही राजपूतों की उत्पत्ति हुई। भारतीय इतिहासकारों में 'ईश्वरी प्रसाद' एवं 'डी.आर. भंडारकर 'ने भारतीय समाज में विदेशी मूल के लोगों के सम्मिलित होने को ही राजपूतों की उत्पत्ति का कारण माना है। भण्डारकर तथा कनिंघम के अनुसार राजपूत विदेशी थे। [24]

स्थानीय उत्पत्ति

इसके विपरीत، चिन्ता राम विनायक वैद्य ने यह साबित करने का प्रयास किया कि राजपूत प्राचीन भारत के क्षत्रियों के समान भी थे थे कि राजपूत प्राचीन काल के क्षत्रियों के वंशज थे। [25] [26] ओझा का मानना ​​था कि मनुस्मृति में कई विदेशी समूह क्षत्रिय थे ، लेकिन ब्राह्मणों को संरक्षण नहीं देने और ब्राह्मणों से दूर रहने के है के शूद्र बन गए दशरथ शर्मा ، डॉ. गौरी शंकर ओझा एवं चिन्तामण विनायक वैद्य अग्निवंश को मात्र काल्पनिक मानते हैं। अग्निवंश सिंधुराज के दरबारी कवि द्वारा गढ़ा गया था [27] राजपूत प्राचीन क्षत्रिय के वंशज हैं। राजपूत बिना किसी हिचकिचाहट के पारंपरिक वंशावली को अपनी विरासत के हिस्से के रूप में स्वीकार करते हैं ، और जो उनके समारोहों (चारणों ، बारहठों ، बदवाओं ، भाटों आदि) द्वारा उन्हें औपचारिक अवसरों पर मिलती है। [28]

उत्पत्ति के समर्थक राजतरंगिणी का उद्धरण भी देते हैं जिसमें 36 क्षत्रिय कुलों का वर्णन मिलता है। [29]

मूल भारतीय उत्पत्ति

हाल के शोध से पता चलता है कि राजपूत विभिन्न जातीय और भौगोलिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ शूद्रों सहित वर्णों से आए थे। . [30] मूल शब्द "राजपुत्र" (शाब्दिक रूप से "एक राजा का पुत्र") पहली बार 11 वीं शताब्दी के संस्कृत शिलालेखों में शाही अधिकारियों के पदनाम के रूप में दिखाई देता है। कुछ विद्वानों के अनुसार ، यह एक राजा के तत्काल रिश्तेदारों के लिए आरक्षित था अन्य लोगों का मानना ​​है कि इसका उपयोग उच्च श्रेणी के पुरुषों के एक बड़े समूह द्वारा किया गया था। व्युत्पन्न शब्द "राजपूत" का अर्थ 15 वीं शताब्दी से पहले 'घुड़सवार'، 'टुकड़ी'، 'एक गांव का मुखिया' या 'अधीनस्थ प्रमुख' था। जिन व्यक्तियों के साथ 15 वीं शताब्दी से पहले "राजपूत" शब्द जुड़ा हुआ था، उन्हें वर्ण-जाति ("मिश्रित जाति का मूल") और क्षत्रिय से हीन माना जाता था। . सबसे कम-भूमि वाले भू-स्वामी तक होता है। [31] [32] [33] [34] अत: ، राजपूत पहचान एक साझा वंश का परिणाम परिणाम नहीं है। बल्कि ، यह तब सामने आया जब मध्ययुगीन भारत के विभिन्न सामाजिक समूहों ने क्षत्रिय स्थिति का दावा करके अपनी नई अधिग्रहीत राजनीतिक शक्ति को वैध बनाने की मांग की। इन समूहों ने अलग-अलग समय पर ، अलग-अलग तरीकों से राजपूत के रूप में पहचान शुरू की। . । [35] [36]

एक समुदाय के रूप में उभरता

मूल शब्द राजपुत्र ("एक राजा का पुत्र") पहली बार कई प्राचीन ग्रंथों، वेदों، में दिखाई देता है، जिसमें राजा، शाही अधिकारियों और अरस्तू के लिए शाही पदनाम हैं। [37] [18]

हर्षवर्धन के उपरान्त भारत में कोई भी ऐसा शक्तिशाली राजा नहीं हुआ जिसने भारत के वृहद भाग पर एकछत्र राज्य किया हो। इस युग में भारत अनेक छोटे बड़े राज्यों में विभाजित हो गया जो आपस मे लड़ते रहते थे। इनके राजा 'राजपूत' (राजपुत्र का भ्रष्ट शब्द) कहलाते थे तथा सातवीं से बारहवीं शताब्दी के इस युग को 'राजपूत युग' कहा गया है। [19] विद्वानों के अलग-अलग मत हैं बारे में की कब 'राजपूत' शब्द ने वंशानुगत वंशावली आधारित स्थिति प्राप्त कर ली थी इतिहासकार ब्रजदुल चट्टोपाध्याय ، शिलालेखों के विश्लेषण के आधार पर (मुख्य रूप से राजस्थान से) ، मान ते है कि 12 वीं शताब्दी तक ، "राजपुत्र" शब्द किलेबंद बस्तियों ، परिजनों पर आधारित भूमि से जुड़े हुए थे ، और अन्य विशेषताएं जो बाद में राजपूत स्थिति का सूचक बन गईं। चट्टोपाध्याय के अनुसार، राजपुत्र शब्द 1300ad से वंशानुगत हो जाता है। पश्चिमी और मध्य भारत से 11 वीं -14 वीं सदी के शिलालेखों का बाद का अध्ययनके अनुसार، इस अवधि के दौरान "राजपुत्र"، "ठाकुर" और "रुटा" जैसे पदनाम जरूरी नहि की वंशानुगत नहीं थे।

हालांकि، 16 वीं शताब्दी के अंत तक، यह रक्त की शुद्धता के विचारों के आधार पर आनुवंशिक रूप से कठोर हो गया था। राजपूत वर्ग की सदस्यता अब सैन्य उपलब्धियों के माध्यम से प्राप्त होने के बजाय काफी हद तक विरासत में मिली थी। इस विकास के पीछे एक प्रमुख कारक मुगल साम्राज्य का समेकन था ، जिसके शासकों की वंशावली में बहुत रुचि थी। जैसे-जैसे विभिन्न राजपूत प्रमुख मुगल साम्राज्य का हिस्सा बनें बन गए، वे एक-दूसरे के साथ बड़े संघर्षों में नहीं लगे। इससे सैन्य कार्रवाई के माध्यम से प्रतिष्ठा प्राप्त करने की संभावना कम हो गई ، और वंशानुगत प्रतिष्ठा को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया [38]


تاريخ صناعة الطائرات في ناكاجيما.


هذا يتكون من أربعة أقسام. الرجاء الضغط على & quotnext & quot في نهاية كل صفحة.

(1) منذ التأسيس وحتى التأسيس (1917 - 1932).

قام الأخوان رايت بأول رحلة بمحرك في عام 1903. وبعد سبع سنوات ، قام الكابتن توكوجاوا بأول رحلة طيران في اليابان ، حيث كان يقود طائرة فارمان في حقل يويوجي للجيش. في عام 1911 ، قامت أول طائرة يابانية تم تصميمها وتصنيعها باسم quotKai-shiki (Type Kai) رقم 1 & quot ، بأول رحلة ناجحة في مطار توكوروزاوا (حاليًا Tokorozawa Air Memorial Park).

في عام 1917 ، أنشأ Chikuhei Nakajima (33 عامًا في ذلك الوقت) ، الذي تقاعد كقائد هندسة للبحرية ، يفكر في تطوير صناعة طائرات عامة ، معهد & quotAirplane Institute & quot في Ojima Town بالقرب من Ota Town في محافظة Gunma (حاليًا Ota City) . كان المبنى عبارة عن كوخ دزني تم إعادة تشكيله ببساطة على طول نهر تون. في البداية ، كان هناك تسعة أعضاء فقط ، ولكن في العام التالي قاموا ببناء أول طائرة & quotNakajima Type 1 & quot بمحرك أمريكي الصنع. لكن النوع الأول تحطم للأسف بعد الإقلاع. فشل النوع الثاني أيضًا ، والثالث أقلع أخيرًا ، لكنه اصطدم بخندق عند الهبوط وتحطم أيضًا. في ذلك العصر ، قيل أنه كان هناك باسكينيد في أوتا تاون ، & quot؛ الكثير من النقود الورقية ، سعر مرتفع للغاية للأرز. كل شيء يرتفع ، باستثناء طائرات ناكاجيما & quot.
بعد التجارب والمحن في فترة التأسيس ، تم الانتهاء أخيرًا من نوع ناكاجيما السادس من النوع 4 وحلقت فوق مدينة أوجيما بفخر.

في عام 1919 ، أقيمت أول مسابقة للطائرة البريدية بين طوكيو وأوساكا. ناكاجيما من النوع 4 أزال المسافة في 3 ساعات و 18 دقيقة ، وهزم الطائرات المستوردة. إلى جانب الجائزة المالية البالغة 9500 ين ، فقد وفرت فرصة جيدة لإثبات تفوقهم الهندسي للجمهور. الشخص الذي أصدر تعليمات لهذا المشروع في كل من الهندسة والإدارة هو Jingo Kuribara. لم يكن شخصًا مبهرجًا بل خجولًا. مهندس مولود ، درس بجد واستحوذ عقله على العصر. كان كوريبارا في ذلك الوقت المدير العام لمصنع دونريو ، وكذلك المدير العام لمصنع أوتا. لعب دورًا رائدًا في تطوير طائرات ناكاجيما لاحقًا. في إدارة المعهد ، بذل كوريبارا طاقته للعثور على أكثر الأشخاص كفاءة.

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على اليسار: & quotAirplane Institute & quot 1918 (حاليًا أوتا سيتي)
إلى اليمين: منتجات ناكاجيما الأولى ، النوع السادس 4 ، 1919

في عام 1920 ، لاحظ الجيش تقدمًا كبيرًا في تكنولوجيا الطائرات خلال الحرب العالمية الأولى في أوروبا ، ودعا فريق تدريب من فرنسا وبدأ أيضًا في دراسة الإنتاج المرخص لهيكل الطائرات والمحركات بجدية. قامت شركة Nakajima Aircraft بإرسال Kimihei Nakajima إلى فرنسا لفترة طويلة من أجل جمع المعلومات والتقنيات المتعلقة بالطائرات. مع هذا كنقطة تحول ، تلقت شركة Nakajima Aircraft طلبًا كبيرًا من الجيش ، وتبع ذلك نمو هائل.

في عام 1922 ، تم الانتهاء من أول طائرة معدنية بالكامل ، ناكاجيما من النوع B-6. تم تصميمه على غرار Breguet 14. النوع B-6 واسمه & quotKei-Gin Go (الفضة الخفيفة) & quot ؛ حيث تم استخدام المعدن الخفيف الوزن الثوري في ذلك الوقت ، duralumin. تم الكشف عنها في & quotPeace Memorial Tokyo Exposition & quot وحصلت على تقييمات عالية. (الصورة أدناه توضح B-6. كان المحرك عبارة عن محرك رولز رويس V12 مبرد بالماء ، 360 حصان)

في عام 1922 ، كان Ichiro Sakuma يبحث في ضواحي طوكيو عن موقع مصنع خاص لمحركات الطائرات ، ووجد واحدًا في Kamiigusa ، Iogi ، Toyotama-Gun (Ogikubo). اشترى مساحة قدرها 12540 م 2 في العام التالي. بدأ البناء على الفور ، وانتهى مصنع طوكيو في عام 1924 وبدأ في ترخيص وتصنيع محركات لورانس المبردة بالماء. تم إنشاء بيئات عمل منفصلة (إنتاج المحرك في طوكيو وإنتاج الهيكل في أوتا) في ذلك الوقت.

من عصر تايشو إلى عصر شوا ، كان هناك تقدم كبير في الهندسة بسبب إدخال التقنيات الأجنبية. في عام 1927 ، أمر الجيش بإجراء مسابقة لإنشاء الجيل التالي من الطائرات المقاتلة. شارك كل من شركة Mitsubishi Internal Combustion Engine Co. و Kawasaki Ship Building و Ishikawajima Aircraft Co. و Nakajima Aircraft Industries. في عام 1928 ، أنتج ناكاجيما طائرة ذات جناح واحد مرتفع مع دعامات ، واسمه Type NC. بالمقارنة مع Mitsubishi و Kawasaki ، اللتين طبقتا النمط الألماني ، مبردة بالماء ، تصميمات متينة قائمة على الخطوط المستقيمة ، كان Nakajima Type NC بهيكل انسيابي ونحيف مع محرك مبرد بالهواء. لقد كان يشبه Nieuport Delage في فرنسا ، وبدا للوهلة الأولى رشيقًا ورشيقًا. تم تصميم جميع طائرات ناكاجيما بأناقة متدفقة كتقليد ، وقيل إن هناك تفاهمًا مشتركًا بين المهندسين بأن & quot ؛ يجب أن تكون الأشياء الحقيقية (الطائرات) التي تصل إلى قمة التميز الهندسي جميلة & quot (الصورة أدناه توضح نوع NC N0.7)

تم تغيير محرك الطائرة من نوع NC بنوع Nakajima Jupiter 7 ، وتم إرفاق قلنسوة من نوع Taunend ، وتم تحسين الجسم بالكامل بجهد كبير. ثم اعتمد الجيش الطائرة كمقاتلة من النوع 91.
في ذلك الوقت ، كانت البحرية تدرس 1928 مقاتلة من طراز Boeing 69B و 1933 Boeing 100D ، لكن ناكاجيما كان يطور مقاتلة أصلية تسمى NY Navy Fighter بشكل مستقل لتتجاوز تلك الطائرات المستوردة. كان N of NY يرمز إلى Nakajima وكان Y لاسم كبير المهندسين ، Takao Yoshida. كانت الطائرة التي يتم تطويرها تستخدم جوبيتر 7 من عائلة بريستول بولدوج الإنجليزية ، وكانت تسمى & quotYoshida Bulldog & quot ولكن لم يتم تبنيها من قبل الجيش. ثم استبدل ناكاجيما كبير المهندسين بـ Jingo Kuribara ، وغير المحرك إلى Nakajima & quotKotobuki (الميمون) & quot ، وتم الانتهاء من & quotNY-Kai (NY-II) & quot في عام 1932. وقد تم الاعتراف بالتحسن الملحوظ في أدائها و تم تبنيها كمقاتلة حاملة من النوع 90. في حفل التفاني والتسمية في هانيدا ، تم إعطاء الاسم & quotHokoku (الروح الوطنية) & quot ، بالإضافة إلى طائرات أخرى من Yokosuka Airforce ، فقد عرضت تشكيلات الأكروبات. من بينها ، تم تقديم عروض الأكروبات الشهيرة التي قدمها الثلاثي الرئيسي من Genda و Okamura و Nomura ، وأصبحت فيما بعد تُعرف باسم & quotGenda Circus & quot. من هنا فصاعدًا ، سرعان ما اشتهر ناكاجيما واحتكر لاحقًا إنتاج الطائرات المقاتلة للجيش والبحرية.

اكتب 90 نوع 2 Carrier Fighter

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أقيمت مسابقة ناكاجيما P-1 Mail Plane الجوية في هانيدا ، 1937

تنظيم مصنع ناكاجيما للطائرات أوتا

1. المدير العام Chikuhei Nakajima
2. مدير العمليات يوهيكو حمادة
3. مدير عام الإنتاج جينغو كوريبارا
4 - ضابط الهندسة تي كوياما ، ساداجيرو أوكوي ، شينوبو مياكي ،
ريوزو ياماموتو ، تاكاو يوشيدا ، كيوشي أكيجاوا
5. مدير مصنع الرسم سيجيرو أوادا ، كاتسوجي ناكامورا
6. أول مصنع المونسنيور العام. ماساو أوماتشي ، إيشيرو سوجيموتو ، هاروماتسو ناجاتو
7. المصنع الثاني المونسنيور العام. شينجي ساساكي ، جينزو ساساكي ، شيكيزابورو أوتاني ،
يانوسوكي كوباياشي
8. المصنع الثالث المدير العام. شينساكو ماسودا ، كاتسونوسوكي إيتوي ، أوكادا
9. المصنع الرابع المونسنيور العام. Ciyomatsu Ando ، Ichitaro Kawase ،
زينساكو ناكامورا
10. المصنع الخامس المونسنيور العام. نوبورو حمادة ، موريتا
11. التفتيش سوروكو أمانو ، كيوتارو إينابا
12. تجربة توشيو ماتوباياشي ، Teiichi Kawabata

المراجع & quot30 عاما من فوجي للصناعات الثقيلة & quot
& quotSilver Wing Forever & quot (مدينة أوتا)
& quotSong of Flight & quot (ناكاجيما-كاي)
روائع الطائرات اليابانية & quot؛ 1959 Zito-sha
تعاون من قسم الاتصالات ، FHI


ماذا يعني الكتاب المقدس بعبارة "أنتم آلهة" / "أنتم آلهة" في مزمور 82: 6 ويوحنا 10:34؟

لنبدأ بإلقاء نظرة على المزمور 82 ، وهو المزمور الذي اقتبسه يسوع في يوحنا 10:34. The Hebrew word translated “gods” in Psalm 82:6 is Elohim. It usually refers to the one true God, but it does have other uses. Psalm 82:1 says, “God presides in the great assembly he gives judgment among the gods.” It is clear from the next three verses that the word “gods” refers to magistrates, judges, and other people who hold positions of authority and rule. Calling a human magistrate a “god” indicates three things: 1) he has authority over other human beings, 2) the power he wields as a civil authority is to be feared, and 3) he derives his power and authority from God Himself, who is pictured as judging the whole earth in verse 8.

This use of the word “gods” to refer to humans is rare, but it is found elsewhere in the Old Testament. For example, when God sent Moses to Pharaoh, He said, “See, I have made you like God to Pharaoh” (Exodus 7:1). This simply means that Moses, as the messenger of God, was speaking God’s words and would therefore be God’s representative to the king. The Hebrew word Elohim is translated “judges” in Exodus 21:6 and 22:8, 9, and 28.

The whole point of Psalm 82 is that earthly judges must act with impartiality and true justice, because even judges must stand someday before the Judge. Verses 6 and 7 warn human magistrates that they, too, must be judged: “I said, `You are gods you are all sons of the Most High.' But you will die like mere men you will fall like every other ruler.” This passage is saying that God has appointed men to positions of authority in which they are considered as gods among the people. They are to remember that, even though they are representing God in this world, they are mortal and must eventually give an account to God for how they used that authority.

Now, let’s look at how Jesus uses this passage. Jesus had just claimed to be the Son of God (John 10:25-30). The unbelieving Jews respond by charging Jesus with blasphemy, since He claimed to be God (verse 33). Jesus then quotes Psalm 82:6, reminding the Jews that the Law refers to mere men—albeit men of authority and prestige—as “gods.” Jesus’ point is this: you charge me with blasphemy based on my use of the title “Son of God” yet your own Scriptures apply the same term to magistrates in general. If those who hold a divinely appointed office can be considered “gods,” how much more can the One whom God has chosen and sent (verses 34-36)?

In contrast, we have the serpent’s lie to Eve in the Garden. His statement, “your eyes will be opened, and you will be like God, knowing good and evil” (Genesis 3:5), was a half-truth. Their eyes were opened (verse 7), but they did not become like God. In fact, they lost authority, rather than gaining it. Satan deceived Eve about her ability to become like the one true God, and so led her into a lie. Jesus defended His claim to be the Son of God on biblical and semantic grounds—there is a sense in which influential men can be thought of as gods therefore, the Messiah can rightly apply the term to Himself. Human beings are not “gods” or “little gods.” We are not God. God is God, and we who know Christ are His children.


Nakajima Ki-82

The Nakajima Ki-82 was a design for a new aircraft to replace the disappointing Nakajima Ki-49 Donryu, but the success of the Mitsubishi Ki-67 meant that the design was never completed.

"During the 1930s Mitsubishi had produced most Japanese heavy bombers, but in 1938 they lost out to the Nakajima Type 100 Heavy Bomber Donryu (Ki-49). This was meant to replace the Mitsubishi Ki-21 Type 97 Bomber, but the new aircraft didn't live up to expectations and never fully replaced the older aircraft.

At the start of 1941 the Japanese Army asked Mitsubishi to begin work on a new bomber to replace the Mitsubishi Ki-49. Mitsubishi were able to reply very quickly and their draft outline was approved on 17 February 1941. This design would become the Mitsubishi Ki-67 Hiryu, the Japanese Army's best bomber of the Second World War.

Nakajima wasn't asked to produce its own design for a new bomber until later in 1941. The new aircraft was to be a smaller and lighter version of the Ki-49. Work began at Nakajima's Mitake Research Division, but by the middle of 1942 it was clear that the design wouldn't be competitive and work on the Ki-82 was abandoned. " Anyone have more info about it ?


Незабаром після запуску в експлуатацію бомбардувальника Mitsubishi Ki-21 командування Імперської армії Японії видало технічне завдання на розробку його наступника. Вимоги технічного завдання перевершувати характеристики كي 21 по багатьох параметрах. Так, літак мав розвивати максимальну швидкість 500 км/год, дальність польоту мала становити 3000 км з бомбовим навантаженням 750 кг, а максимальне бомбове навантаження мало становити 1000 кг. Крім того, літак мав захищати себе сам, без супроводу винищувачів, тому він повинен був мати серйозне оборонне озброєння: 20-мм гармату у надфюзеляжній башті та декілька 7,7-мм кулеметів, в тому числі, у хвостовій башті. Крім того, літак мав мати протектовані паливні баки та бронезахист членів екіпажу, що було нетипово для японських літаків.

У конкурсі знову взяли участь дві провідні авіабудівні фірми Японії - Nakajima та Mitsubishi, проекти яких отримали назви Ki-49 та Mitsubishi Ki-50 відповідно. Фірма Nakajima врахувала помилки при проектуванні літака Nakajima Ki-19, який свого часу програв літаку كي 21, а також залучила до розробки найкращих своїх спеціалістів. Крім того, програвши у 1937 році у конкурсі фірмі ميتسوبيشي, інженери фірми Nakajima змогли ознайомитись з технічними особливостями літака-переможця كي 21. Завдяки цим знанням у конкурсі на новішу модель переміг саме літак фірми Nakajima.

Роботи над новим літаком розпочались влітку 1938 року, а вже у серпні 1939 року перший прототип піднявся у повітря. Під час розробки дизайну літака особливу увагу було звернену на покращення керування, для цього було вибрано модель в вигляді середньоплана з крилом малої довжини, що забезпечувало хорошу керованість на середніх та малих висотах. Крім того, хорда центроплана була більшою за хорду консолі за мотогондолою, що дозволило розмістити в центроплані шість протектованих паливних баків та знизити загальний повітряний опір. Для покращення посадки і підйому на літаку використовувались закрилки Фаулера. На першому прототипі були встановлені двигуни Nakajima Ha-5 Kai потужність 950 к.с., на другому та третьому прототипах - двигуни Nakajima Ha-41 (1200 к.с.).Захисне озброєння складалось з 20 мм гармати «Но-1» зверху на фюзеляжі، а також по одному 7،7-мм кулеметі «Тип 89» в носі، в хвості، знизу і з двох сторін літака.

ипробування літака пройшли вдало، командування замовило 7 передсерійних машин. Але через завантаженість інженерів фірми ناكاجيما роботами по доводці винищувача Nakajima Ki-44 протягом 1940 було випущено лише 7 передсерійних літаків. конструкцію внесли лише невеликі зміни у у березні 1941 року літак був прийнятий на озброєнвя под «ажкий армійський бомбардувальник Тип 100 одель 1« Донрю »(«Ширяючий дракон») » (або كي -49-أنا). сього було випущено 129 машин цієї модифікації.

1942 році була розроблена модифікація كي -49-إي з двигунами ناكاجيما هاء 109 потужністю 1500 к.с. Також були внесені невеликі зміни у форму мотогондол، був встановлений новий бомбовий приціл، посилений бронезахист екіпажу، паливні баки мали кращий захист. уло випущено 2 варіанти цієї модифікації: كي -49-إيا та Ki-49-IIb، які відрізнялись захисним озброєнням. а другому варіанті три з п'яти 7،7-мм кулеметів були замінені 12،7-мм кулеметами «ип 1». сього було випущено 667 машин модифікації، в тому було на заводі рми Tachikawa.

була розроблена модифікація عام 1943 كي - 49 - الثالث з двигунами ناكاجيما هاء 117 потужністю 2420 к.с. Але через проблеми з доводкою двигунів було випущено лише 6 машин.

Під час бойових дій в Китаї було виявлено، що наявні на озброєнні винищувачі не можуть супроводжувати бомбардувальники на всьому проміжку до цілі، що спричиняє великі втрати серед останніх. ому на базі трьох передсерійних машин у 1940-1941 була розроблена модифікація важкого винищуваоновинищувачова كي -58، яка мала посилений бронезахист та озброєння (п'ять 20-мм гармат «Ho-1» в рухомих вогневих точках та три 12،7-мм кулемети «Ho-103»). Скіпаж складався з 10 осіб - два пілоти، бомбардир، турман، стрілець-радіооператор та 5 стрільців. винищувачі мали прикривати з'єднання كي -49، але з появою винищувачів Nakajima Ki-43 потреба у كي -58 відпала. уло виготовлено тільки три прототипи كي -58.

овтні 1941 року два літаки كي -49-أنا були переобладнані в літаючий командний пункт كي -80. а цих літаках були встановлені двигуни ناكاجيما هاء 117 потужністю 2420 к.с. та посилений бронезахист. зброєння складалось з однієї 20-мм гармати «Ho-1» та семи кулеметів - одного 12،7-мм «Ho-103» та шести «7،7-мати» кіпаж збільшився до 12 осіб: два пілоти، командир з'єднання، ​​бомбардир، турман، два стрільіоран. омбове навантаження зменшилось до 300 كغ. Але у серію літаки не пішли: вони використовувались для доопрацювання двигунів ناكاجيما هاء 117. [1]


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  • مدرسة أكينو للتدريب على الطيران العسكري
  • مدرسة هيتاشي للتدريب على الطيران العسكري
    تشغيل بعض الطائرات التي تم الاستيلاء عليها من IJAAF و MAF.
    (IPSF - رجال حرب العصابات الإندونيسيين المؤيدين للاستقلال) استولوا على عدد صغير من الطائرات في العديد من القواعد الجوية اليابانية في عام 1945 ، بما في ذلك قاعدة بوغيس الجوية في مالانج (أعيدت إلى الوطن في 18 سبتمبر 1945). تم تدمير معظم الطائرات في النزاعات العسكرية بين هولندا وجمهورية إندونيسيا المُعلنة حديثًا خلال الثورة الوطنية الإندونيسية 1945-1949.


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